धुरंधर 2: जहाँ पॉलिटिक्स सिर्फ कहानी नहीं, बल्कि सच्चाई से भी ज्यादा गहरी है!

बॉलीवुड में कुछ ही फिल्ममेकर ऐसे होते हैं, जो अपनी पहली फिल्म से ही एक खास स्टाइल और नैरेशन का बेंचमार्क सेट कर देते हैं। आदित्य धर उनमें से एक हैं। ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’ के साथ उन्होंने न सिर्फ एक ब्लॉकबस्टर दी, बल्कि भारतीय सिनेमा में ‘फैक्ट और फिक्शन’ के मिश्रण को एक नया आयाम दिया। अब उनकी नवीनतम पेशकश ‘धुरंधर 2’ सिनेमाघरों में धूम मचा रही है, और यह फिल्म अपने पहले पार्ट से भी कहीं आगे जाकर पॉलिटिक्स और सच्चाई के बीच की पतली दीवार को धुंधला कर रही है।

‘धुरंधर’ में जब आर. माधवन का किरदार एक मजबूत भारत सरकार के लिए आशावादी नजर आता था, तभी ये स्पष्ट था कि फिल्म की पॉलिटिक्स आगे कहाँ मुड़ने वाली है। मगर ‘धुरंधर 2’ का सरप्राइज ये है कि इस बार पॉलिटिकल रंग फिल्म पर पहले से भी ज्यादा चढ़ा हुआ है। यह फिल्म अपने राजनीतिक झुकाव को छिपाने का कोई संकोच नहीं करती, बल्कि उसे खुलकर सामने लाती है। यह सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि फैक्ट्स और फिक्शन की एक ऐसी लस्सी है, जिसे पीकर दर्शक सोचने पर मजबूर हो जाते हैं।

धुरंधर 2 पॉलिटिक्स

धुरंधर 2: जहाँ पॉलिटिक्स सिर्फ कहानी नहीं है

पिछले कुछ सालों से फिल्मों में पॉलिटिक्स का गहरा प्रभाव कोई नई बात नहीं है, लेकिन ‘धुरंधर 2’ की खासियत यह है कि पॉलिटिक्स इसके नैरेटिव में इस कदर घुल-मिल गई है कि फैक्ट्स और फिक्शन को एक-दूसरे से अलग करके देख पाना मुश्किल हो जाता है। यह फिल्म सिर्फ नेताओं के भाषणों या संसद की बहस तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आम आदमी की कल्पना और जिज्ञासा को भी भुनाती है, जो ‘खाली स्थानों को भरने’ का आनंद लेना चाहता है।

उदाहरण के तौर पर, जब 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक की खबर आई, तो लोगों को इसके विजुअल्स चाहिए थे। सरकार द्वारा दी गई सीमित जानकारी के बावजूद, दिमागों ने अपनी ‘रीडिंग्स’ निकालनी शुरू कर दीं – ‘यूँ हुआ होगा, वैसे घुसे होंगे, इस तरह मारा होगा।’ आदित्य धर ने ‘उरी’ के साथ इसी जिज्ञासा को शांत किया। ‘धुरंधर 2’ भी इसी ‘खाली स्थान भरो’ सिनेमा की परंपरा को आगे बढ़ाती है, जहाँ क्रिएटिव लिबर्टी लिए गए विजुअल्स के साथ दिमाग में बैठते चले जाते हैं और धीरे-धीरे फिक्शन, फैक्ट्स की जगह लेने लगता है।

इस तरह की फिल्ममेकिंग की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि दर्शक अक्सर रियल घटनाओं पर चर्चा करते हुए कहने लगते हैं, ‘उस फिल्म में भी थी ये चीज!’ और यही चीज ‘धुरंधर 2’ को एक बहुत बड़ी ब्लॉकबस्टर बनाने वाली है।

फैक्ट्स और फिक्शन की लस्सी: आदित्य धर का मास्टरस्ट्रोक

आदित्य धर का स्टाइल उनकी पिछली फिल्मों ‘उरी’ और ‘आर्टिकल 370’ में भी साफ दिखा है। उनका प्रोडक्शन ‘आर्टिकल 370’ भी कुछ ऐसा ही करती है। वे जानते हैं कि कैसे दर्शकों की उत्सुकता को फिल्म के नैरेटिव में शामिल करना है। वे सिर्फ कहानी नहीं सुनाते, बल्कि एक ऐसा अनुभव देते हैं, जहाँ दर्शक को लगता है कि वे एक बड़ी राष्ट्रीय या राजनीतिक घटना के पर्दे के पीछे की सच्चाई देख रहे हैं, भले ही उसमें काल्पनिक तत्वों का मिश्रण हो।

यह एक ऐसा सिनेमा है जो दर्शकों की ‘इन्फॉर्मेशन का विजुअल‘ देखने की स्वाभाविक जिज्ञासा को पूरा करता है, और सोशल मीडिया के दौर में यह जिज्ञासा सामूहिक और फास्ट एंड फ्यूरियस हो जाती है। ‘धुरंधर 2’ में आदित्य धर ने इसी कला का शानदार प्रदर्शन किया है, जहाँ पॉलिटिक्स केवल एक पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि कहानी का डीएनए है।

(अधिक जानकारी के लिए पढ़ें: बॉलीवुड में पॉलिटिकल ड्रामा फिल्में)

कितना फैक्ट, कितना फिक्शन? किरदारों की पड़ताल

‘धुरंधर 2’ की सबसे आकर्षक बात इसके किरदार हैं, जो फैक्ट और फिक्शन के बीच झूलते रहते हैं:

  • जसकीरत सिंह रांगी उर्फ हमजा अली मजारी (रणवीर सिंह का किरदार): यह पूरी तरह से एक काल्पनिक किरदार है।
  • रहमान डकैत: यह पाकिस्तान में एक रियल खूंखार गैंगस्टर हुआ है। फिल्म में उसे कल्पना का पुट दिया गया है।
  • मेजर इकबाल: यह किरदार भारत के लिए नासूर रहे कई आतंकियों को मिलाकर तैयार किया गया लगता है। उसका लुक पाकिस्तानी आतंकी इलियास कश्मीरी जैसा है, लेकिन काम कई अलग-अलग आतंकियों से मिलते हैं।
  • जमील जमाली: यह किरदार पाकिस्तानी पॉलिटिशियन नबील गबोल से प्रेरित लगता है, लेकिन फिल्म में जमील का जो सीक्रेट रिवील हुआ है, वह रियल लाइफ में सच नहीं है।
  • अजय सान्याल (मिशन धुरंधर की नींव रखने वाले भारतीय ऑफिसर): यह किरदार रियल लाइफ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल पर पूरी तरह से मॉडल किया गया है। यह फैक्ट के बहुत करीब खड़ा फिक्शन है।

प्रधानमंत्री के कैमियो और नोटबंदी का असर

‘धुरंधर 2’ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दो कैमियो हैं – डायरेक्ट नहीं, इनडायरेक्ट। फिल्म में उनके शपथग्रहण और नोटबंदी की अनाउंसमेंट वाली वीडियो फुटेज है। पाकिस्तान में सेट फिल्म के किरदार मेजर इकबाल, जावेद खनानी और बड़े साहब उर्फ दाऊद इब्राहिम ये दोनों फुटेज देखकर रिएक्ट करते दिखते हैं।

‘धुरंधर’ में खनानी भाइयों की फैक्ट्री में छपे नकली नोट भारत में पहुंचने का रूट बताया गया था – कराची-नेपाल-उत्तर प्रदेश-इंडिया की बाकी जगहें। ‘धुरंधर 2’ में इन नोटों का लॉन्च पैड उत्तर प्रदेश में एक नेता कम, गैंगस्टर के अड्डे को दिखाया गया है। नेता का नाम है – आतिफ अहमद। कद-काठी-आवाज से यह किरदार रियल लाइफ में गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद की याद दिलाता है। यह किरदार कराची में बैठे दाऊद इब्राहिम, खनानी ब्रदर्स और मेजर इकबाल से डायरेक्ट कनेक्टेड है।

प्रधानमंत्री मोदी ने नोटबंदी अनाउंस करते हुए इस फैसले से आतंकवाद की कमर तोड़ने की बात कही थी। ‘धुरंधर 2’ में नोटबंदी पर एक पूरा चैप्टर है, जो दिखाता है कि कैसे सरकार के इस फैसले से कराची तक असर पड़ा है। दाऊद इब्राहिम एक ‘चाय वाले’ से तंग नजर आ रहा है। मेजर इकबाल और उसका बाप एक ‘चाय वाले’ से त्रस्त हैं। आतिफ अहमद झल्लाते हुए कह रहा है – ‘एक चाय वाला घुस के फट गया है हम में!’ यह डायलॉग फिल्म की पॉलिटिक्स और उसके वास्तविक जीवन से जुड़ाव को बहुत मजबूती से दिखाता है।

(और पढ़ें: फैक्ट और फिक्शन का मिश्रण: सिनेमा का नया ट्रेंड)

निष्कर्ष: धुरंधर 2 – एक पॉलिटिकल मास्टरपीस?

‘धुरंधर 2’ सिर्फ एक एक्शन-थ्रिलर नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा में पॉलिटिक्स को दर्शाने का एक नया तरीका है। आदित्य धर ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे उन कहानियों को कैसे पर्दे पर लाते हैं, जो दर्शकों के दिमाग में सवाल पैदा करती हैं और उन्हें सोचने पर मजबूर करती हैं। फिल्म का फैक्ट और फिक्शन का अनूठा मिश्रण, रियल लाइफ घटनाओं और किरदारों से प्रेरणा लेना, और पॉलिटिकल नैरेटिव को इतनी सहजता से कहानी में ढालना, इसे एक खास अनुभव बनाता है। अगर आप ऐसी फिल्म देखना चाहते हैं जो न सिर्फ आपका मनोरंजन करे बल्कि आपको सोचने पर भी मजबूर करे, तो ‘धुरंधर 2’ आपके लिए ही बनी है। यह एक ऐसी फिल्म है जहाँ पॉलिटिक्स सिर्फ कहानी का हिस्सा नहीं, बल्कि कहानी की आत्मा है।

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