हाल ही में अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर किए गए हमले ने न केवल पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा दिया है, बल्कि भारत की घरेलू राजनीति में भी भूचाल ला दिया है। 19 मार्च, 2026 को हुए इस घटनाक्रम के बाद, विपक्ष ने भारत सरकार की चुप्पी पर तीखे सवाल उठाए हैं। इस बहस के केंद्र में अब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर का बयान आया है, जिन्होंने सरकार के रुख को ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ मानने से इनकार किया है, बल्कि इसे एक ‘जिम्मेदार कूटनीति’ करार दिया है।
मुख्य बिंदु
- अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले के बाद भारत की चुप्पी पर देश में बहस छिड़ी।
- सोनिया गांधी ने सरकार की कड़ी आलोचना की, जबकि शशि थरूर ने इसका बचाव किया।
- थरूर का तर्क है कि भारत का यह रुख ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ नहीं, बल्कि ‘जिम्मेदार कूटनीति’ है।
- उन्होंने भारत के राष्ट्रीय हितों, आर्थिक संबंधों और रणनीतिक साझेदारियों को अपनी दलील का आधार बनाया।
ईरान युद्ध 2026: भारत की विदेश नीति पर क्यों छिड़ी है बहस?
ईरान पर भारत की चुप्पी का मुद्दा इन दिनों देश की राजनीति में गर्म है। पश्चिम एशिया में 2026 में छिड़े इस नए संघर्ष ने वैश्विक भू-राजनीति को एक बार फिर गरमा दिया है। इस संवेदनशील स्थिति में, भारत के पारंपरिक रुख को लेकर कई सवाल उठाए जा रहे हैं।

सोनिया गांधी की आलोचना और सरकार पर सवाल
कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने सरकार की निष्क्रियता पर गहरी चिंता व्यक्त की थी। उन्होंने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की एयर स्ट्राइक में हुई मौत की निंदा न करने और ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर भारत की चुप्पी को लेकर सरकार पर कड़े प्रहार किए थे। सोनिया गांधी का मानना था कि भारत को अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता के सिद्धांतों का मुखरता से समर्थन करना चाहिए।
शशि थरूर का पलटवार: ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ नहीं, ‘जिम्मेदार कूटनीति’
सोनिया गांधी के तीखे हमले के बाद, कांग्रेस के ही एक अनुभवी नेता, शशि थरूर ने अपनी पार्टी के रुख से इतर एक अलग दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में लिखे अपने लेख में स्पष्ट किया कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष पर भारत की चुप्पी को नैतिक आत्मसमर्पण कहना गलत है। थरूर ने जोर देकर कहा कि यह वास्तव में एक जिम्मेदार कूटनीति (responsible statecraft) का उदाहरण है, जो भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय व्यावहारिक कूटनीतिक संतुलन पर आधारित है।
सिद्धांत और व्यावहारिकता का संतुलन: थरूर की दलील
थरूर ने अपनी दलील में भारत की विदेश नीति के ऐतिहासिक पहलुओं को रेखांकित किया। उनका कहना है कि भारत ने हमेशा सिद्धांत और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाए रखा है। यह कोई नई बात नहीं है, बल्कि यह भारत की कूटनीतिक विरासत का हिस्सा है।
गुटनिरपेक्षता से मल्टी-अलाइनमेंट तक
थरूर ने पंडित जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति का उदाहरण दिया। उन्होंने समझाया कि शीत युद्ध के दौरान यह नीति सिर्फ एक नैतिक रुख नहीं थी, बल्कि राष्ट्रीय हितों की रक्षा का एक व्यावहारिक तरीका भी था। आज के बहुध्रुवीय विश्व (Multipolar World) में भारत मल्टी-अलाइनमेंट की नीति पर चल रहा है, जिसका अर्थ है कि वह विभिन्न वैश्विक शक्तियों के साथ संबंध बनाए रखते हुए अपने हितों को प्राथमिकता देता है।
ऐतिहासिक मिसालें: जब भारत ने चुप्पी साधी
शशि थरूर ने आलोचकों को याद दिलाया कि भारत ने अतीत में भी कई बार राष्ट्रीय हितों के लिए चुप्पी साधी है। उन्होंने 1956 में हंगरी, 1968 में चेकोस्लोवाकिया और 1979 में अफगानिस्तान में सोवियत हस्तक्षेप का जिक्र किया। इन घटनाओं के दौरान भारत ने सोवियत संघ का खुलकर विरोध नहीं किया था, क्योंकि उस समय सोवियत संघ भारत का एक प्रमुख रक्षा साझेदार था। यह दर्शाता है कि विदेश नीति में हमेशा तात्कालिक सिद्धांतों से अधिक राष्ट्रीय हित सर्वोपरि होते हैं।
खाड़ी क्षेत्र और अमेरिका से संबंध: भारत के राष्ट्रीय हित
भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र (वेस्ट एशिया) का रणनीतिक और आर्थिक महत्व अद्वितीय है। किसी भी एक पक्ष के खिलाफ कड़ा रुख अपनाना भारत के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है, जैसा कि थरूर ने अपनी दलील में स्पष्ट किया।
आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा
थरूर के अनुसार, भारत का खाड़ी क्षेत्र के साथ हर साल लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है। देश की ऊर्जा जरूरतें काफी हद तक इसी क्षेत्र पर निर्भर हैं, और लगभग 90 लाख भारतीय वहां काम करते हैं, जो भारत को बड़ी मात्रा में प्रेषण (remittances) भेजते हैं। ऐसे में, इस क्षेत्र में अस्थिरता या किसी एक पक्ष के खिलाफ सार्वजनिक निंदा से भारत के ये महत्वपूर्ण हित खतरे में पड़ सकते हैं। भारत की आर्थिक स्थिरता और ऊर्जा सुरक्षा सीधे तौर पर इस क्षेत्र की शांति से जुड़ी है।
अमेरिका के साथ सामरिक साझेदारी
शशि थरूर ने अमेरिका के साथ भारत के बढ़ते रणनीतिक रिश्तों पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि मौजूदा अमेरिकी नेतृत्व, खासकर डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता, अक्सर अपने हितों के खिलाफ जाने वालों पर सख्त रुख अपनाते हैं। ऐसे में, भारत के लिए रक्षा सहयोग, तकनीकी साझेदारी और चीन के बढ़ते प्रभाव जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए अमेरिका के साथ संतुलित संबंध बनाए रखना आवश्यक है। विदेश नीति नैतिक भाषणबाजी का मंच नहीं, बल्कि वह क्षेत्र है जहां सिद्धांतों और शक्ति के बीच संतुलन साधना पड़ता है।
क्या चुप्पी का मतलब युद्ध का समर्थन है?
थरूर के मुताबिक, भारत की चुप्पी का मतलब कतई यह नहीं है कि वह युद्ध का समर्थन करता है या अंतरराष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन स्वीकार करता है। यह एक रणनीतिक विकल्प है, जो देश को अपने हितों की रक्षा करते हुए कूटनीतिक संवाद के रास्ते खुले रखने में मदद करता है।
कूटनीतिक विकल्प के रूप में मौन
थरूर ने स्पष्ट किया कि कई बार चुप्पी भी एक प्रभावी रणनीति हो सकती है। यह अनावश्यक टकराव से बचाते हुए शांति की दिशा में काम करने का अवसर देती है। किसी बड़ी शक्ति की बिना पर्याप्त प्रभाव (leverage) के खुलकर आलोचना करना व्यावहारिक नहीं होता और इससे केवल देश के हित ही प्रभावित हो सकते हैं। भारत अपनी विदेश नीति को ऐसे नाजुक समय में बहुत सावधानी से संचालित कर रहा है।
नैतिक आदर्शवाद बनाम वास्तविक कूटनीति
उन्होंने आलोचकों को सलाह दी कि वे नैतिक आदर्शवाद और वास्तविक कूटनीतिक जरूरतों के बीच फर्क समझें। महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के मूल्यों का जिक्र करते हुए थरूर ने कहा कि उनकी विरासत कठोर सिद्धांतों पर अड़े रहने की नहीं, बल्कि समय के अनुसार लचीलेपन और राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देने की थी। भारत की वर्तमान जिम्मेदार कूटनीति इसी विरासत का विस्तार है, जहां वैश्विक शांति और अपने नागरिकों के हितों को सर्वोपरि रखा जाता है।
यह दिखाता है कि भारत की विदेश नीति जटिल वैश्विक परिदृश्यों में अपने राष्ट्रीय हितों को साधने के लिए एक सूक्ष्म और विचारशील दृष्टिकोण अपनाती है, भले ही कभी-कभी उसे बाहरी रूप से ‘चुप्पी’ के रूप में देखा जाए।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
प्रश्न 1: अमेरिका-इजरायल ने ईरान पर हमला कब किया?
उत्तर: समाचार स्निपेट के अनुसार, अमेरिका और इजरायल ने 19 मार्च, 2026 को ईरान पर हमला किया।
प्रश्न 2: सोनिया गांधी ने भारत सरकार की किस बात पर आलोचना की थी?
उत्तर: सोनिया गांधी ने ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई की एयर स्ट्राइक में हुई मौत की निंदा न करने और ईरान की संप्रभुता के उल्लंघन पर भारत की चुप्पी को लेकर सरकार की आलोचना की थी।
प्रश्न 3: शशि थरूर ने भारत की चुप्पी को क्या नाम दिया है?
उत्तर: शशि थरूर ने भारत की चुप्पी को ‘नैतिक आत्मसमर्पण’ के बजाय ‘जिम्मेदार कूटनीति’ (Responsible Statecraft) करार दिया है।
प्रश्न 4: भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर: भारत के लिए खाड़ी क्षेत्र इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से सालाना लगभग 200 अरब डॉलर का व्यापार होता है, देश की ऊर्जा जरूरतें इस पर निर्भर करती हैं, और लगभग 90 लाख भारतीय वहां काम करते हैं, जो भारत को महत्वपूर्ण प्रेषण भेजते हैं।